सन्नो व् राजेश को फाँसी की सजा मिलनी चाहिए

mirdhanpur 19 convicts life imprisonment in triple murder
अभी हाल में ही हुए दो निर्णय अपनी उस मानवता के कारण विवादों में हैं जिस मानवता के मामले के आरोपी हक़दार थे ही नहीं .समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बने ये समाचार इस कदर दिल दहला रहे हैं कि एक बार तो मन ये किया कि स्वयं न्यायिक अधिकारी की कुर्सी पर बैठकर सन्नो व् नौसेना अधिकारी राजेश कुमार भदोरिया को तुरंत फांसी की सजा सुना दूँ .मामले क्या हैं पहले एक बार आप भी ये जानिए -

[1]खून पीकर बोली थी सन्नो, आज मेरी ईद हो गई

बागपत। छह अप्रैल 2011 को हाजी हमीद घर के बाहर बनी दुकान पर थे। वहीं पर कातिलों ने उन्हें गोली मारी। वे गिर पड़े। फिर उनका पेट तलवार से फाड़ दिया। 20 के 20 कातिलों ने उनकी लाश पर पैर रखे और नाचने लगे। तभी सन्नो झुकी, उसने लाश पर अपने दांत गाड़ दिए। खून पिया और अगले ही पल झटके से उठी। बाल झटकते हुए जोर से एक नारा लगाया। फिर बोली, आज मेरी ईद हो गई। इसके बाद एक हाथ हमीद के खून से रंगा। उसे दीवार पर छाप दिया। इसके निशान आज भी हैं। 
मिर्धानपुरा में बेदर्दी से कत्ल किए हाजी हमीद और नवाबुद्दीन उर्फ भूरा के सगे भाई रफीक इस ट्रिपल मर्डर के चश्मदीद हैं। दोनों भाइयों और भतीजे साबिर की हत्या की रिपोर्ट रफीक ने ही दर्ज कराई थी। उन्होंने अदालत का फैसला आने के बाद अमर उजाला से बातचीत में पूरा घटनाक्रम बयां किया। उनके मुताबिक कत्ल की साजिश का ताना-बाना सन्नो ने बुना था। दरअसल, कुछ दिन पहले सन्नो के पति शाहिद की पाली गांव के पास गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई थी। वह कलक्ट्रेट में कर्मचारी था और हाजी हमीद का दोस्त था। उसकी जगह ही सन्नो को मृतकाश्रित के रूप में नौकरी मिली। 
उसे लगता था कि शाहिद की हत्या हाजी हमीद ने कराई। इस मामले में हमीद को जेल भी जाना पड़ा था। उनके जमानत पर आते ही सन्नो ने खून का बदला खून से लेने की ठान ली थी। उसका परिवार उसके साथ था। वे लोग खून-खराबे का बहाना ढूंढ रहे थे। बार-बार धमकी दे रहे थे। छह अप्रैल 2011 को सन्नो के परिवार के दो युवकों ने हमीद के परिवार की एक लड़की से छेड़छाड़ की। हमीद इसकी शिकायत लेकर पहुंचे। बस इसी से सन्नो के परिवार को बहाना मिल गया। वे लोग हाजी हमीद के परिवार के खून के प्यासे तो पहले से ही थे। 
तलवार और तमंचे लेकर टूट पड़े। सबसे पहले हमीद का कत्ल किया। फिर घर के अंदर जाकर भूरा को मारा। साबिर ने हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाया, फिर भी उसे गोली मार दी। उसका अंगूठा भी काट लिया। 
हमीद की बीवी शकीला की टांग में गोली मारी। बेटी बुशरा अपनी मां की तरफ दौड़ी, उस पर तलवार से वार किया। इसके बाद कातिल फायरिंग करते हुए खादर की तरफ भागे। वहां यमुना पार करके फिर से काफी देर तक नाचे। वे लोग कत्ल की खुशी मना रहे थे। जब पुलिस आ गई, तब भाग निकले। तिहरे हत्याकांड के कुछ दिन बाद रफीक पूरे परिवार को लेकर कैराना के रामड़ा गांव में जाकर रहने लगे। वहीं से हर तारीख पर आकर पूरे केस की पैरवी की। 

-वे तो सबको मारते जा रहे थे 
बागपत। मिर्धानपुरा कांड में तलवार लगने से घायल हुए हाजी हमीद की बेटी बुशरा (11) को भी कत्ल का खौफनाक मंजर पूरी तरह याद है। उसने बताया कि वे लोग (कातिल) किसी को नहीं छोड़ रहे थे, जो भी सामने आ रहा था, उसे ही गोली मार रहे थे, या तलवार से काट रहे थे। न बच्चों पर तरस खा रहे थे, न महिलाओं पर।
[2]-नौसेना अधिकारी को उम्रकैद -ठाणे के ब्रह्मानन्द हाऊसिंग कॉम्प्लेक्स के निवासी आरोपी अधिकारी राजेश कुमार भदौरिया ने ३० मार्च २०१० को अपनी पत्नी संगीता और पांच साल की मासूम बेटी की पिसाई वाले पत्थर से मार-मारकर हत्या कर दी थी
   निर्मल सिंह बनाम हरियाणा राज्य ए.आई.आर .१९९९ एस.सी.१२२१ में बलात्संग का आरोपी जमानत पर बाहर आया व् पीड़िता के माता पिता ,दोनों भाई व् एक बहन की साक्षी देने के कारण हत्या कर दी और यह कृत्य उसने कुल्हाड़ी से अंजाम दिया था साथ ही यह काम दुराचारी मानसिकता का तथा पाशविक एवं जघन्य प्रकृति का था उच्चतम न्यायालय ने इसे विरल से  विरलतम माना व् मृत्युदंड की पुष्टि की .
  किन्तु कुंजू कुंजू बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य क्रि.अपील.५११ १९७८ में एक विवाहित व्यक्ति द्वारा अपने अवैध सम्बन्ध के कारण पत्नी व् दो छोटे बच्चों की हत्या पर न्यायाधीशों ने २:१ के मत से अभियुक्त के मृत्यु दंड को आजीवन कारावास में बदल दिया जबकि न्यायमूर्ति ए.पी.सेन ने विसम्मत रहते हुए मत व्यक्त किया कि - 
    ''अभियुक्त ने एक राक्षसी कृत्य किया है तथा अपनी पत्नी तथा उससे पैदा हुए दो निर्दोष नन्हें बच्चों की हत्या करने में भी वह नहीं हिचकिचाया .यदि इस प्रकार के मामले में भी मृत्युदंड न दिया जाये ,तो मुझे समझ में नहीं आता कि मृत्युदंड किस प्रकार के मामलों में दिया जा सकता है .''  
उपरोक्त दोनों ही मामले इस श्रेणी में आते हैं .एक बार को रिवाल्वर लेकर की गयी हत्या जघन्य नहीं कही जा सकती किन्तु इन दोनों ही वारदात में अपराध जिस हथियार से किया गया है वह वारदात को जघन्य बनाता है .पीसने वाले पत्थर से पत्नी व् नन्ही बच्ची को मारना तो ह्रदय विदारक है ही साथ ही सन्नो वाला मामला तो पूर्णतया राक्षसी कृत्य है अपराधियों द्वारा लाश को पैर मारना ,उसके इर्द गिर्द नाचना ,तलवार से पेट फाड़ना किसी अपराध के प्रतिशोध की प्रतिक्रिया नहीं कह सकते और यहाँ तो सभी कृत्य हमारे समज में राक्षस युग की शुरुआत करते हैं और सन्नो द्वारा लाश के पेट में हाथ दे खून म एहत रंगना उसे दीवार पर छापना और खून पीना उसे ड्रैकुला के समकक्ष कर देता है  फिर जब मामला कोर्ट के विचारधीन हो और सन्नो के पति की हत्या का मामला एकदम ताज़ा नहीं था कुछ समय पूर्व का था और उसमे पीड़ित जेल भी काटकर जमानत पर बाहर आया हुआ था ऐसे में गंभीर व् अचानक प्रकोपन का बचाव भी उन्हें नहीं दिया जा सकता .
    और इस सबके बावजूद अपराधियों का सजा मिलने पर मुस्कुराता हुआ चेहरा यही  बताता  है कि कानून उनके  लिए  केवल  एक  मखौल  है और कुछ नहीं .


  
ऐसे में इन सभी अपराधियों को विशेषकर सन्नो व् राजेश को फाँसी की सजा मिलनी चाहिए क्योंकि ये किसी मानवीय भावना के हक़दार हैं ही नहीं .
                  शालिनी कौशिक 

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