दूर के ढोल सुहावने नामित सभासदों के


 बोर्ड की मजबूती, विकास कार्यों की शपथ आदि न जाने कितनी लुभावने राजनीतिक बयानबाजी से भरपूर हैं आजकल के नगरपालिका प्रशासन मे राज्य सरकार द्वारा मनोनीत सभासदों के शपथ ग्रहण समारोह, पहले भी होते रहे हैं आगे भी होते रहेंगे किन्तु चुनावी बेला में ऐसे समारोहों में बहुत कुछ ऐसा मनगढंत प्रचारित किया जाता है जिससे कानून भी बगलें झांकता नजर आता है.

उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम 1916 की धारा 9 जिसे उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 12 सन 1994 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया की उपधारा (1) घ में कहा गया है कि

(घ) नाम निर्दिष्ट सदस्य जो राज्य सरकार द्वारा, सरकारी गजट में विज्ञप्ति द्वारा, नगरपालिका प्रशासन में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से नामित किये जायेंगे और जिनकी संख्या-

(एक) नगर पंचायत की दशा में, दो से कम और तीन से अधिक नहीं होगी;

(दो) नगरपालिका परिषद् की दशा में तीन से कम और पाँच से अधिक नहीं होगी।

इसके साथ ही अधिनियम मे यह भी उल्लिखित किया गया है कि -

"किन्तु प्रतिबंध यह है कि खण्ड (घ) में निर्दिष्ट व्यक्तियों को नगरपालिका की बैठकों में मत देने का अधिकार नहीं होगा.

साथ ही, 2005-2006 के दौरान शहरी स्थानीय निकायों से संबंधित ऑडिट रिपोर्टों में 1916 के अधिनियम और 74वें संविधान संशोधन (1992) के तहत नगर निकायों को सशक्त बनाने की बात कही गई जिसके अंतर्गत उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम (अधिनियम संख्या 8, 2005)" का प्रावधान 2005 के अधिनियम के बजाय 1916 का अधिनियम ही विभिन्न संशोधनों (जैसे 1994, 1995, 2005 के आस-पास के संशोधनों) के माध्यम से वर्तमान समय में क्रियाशील रखा गया है जिसके तहत महिलाओं के लिए सदस्यों की कुल संख्या का एक-तिहाई (1/3) आरक्षण अनिवार्य कायम किया गया है और नामित सभासदों में महिलाओं की नियुक्ति भी राज्य सरकार द्वारा की गई है. 

   किन्तु जैसा कि विदित है कि मनोनीत सभासदों को नगरपालिकाओं की बैठक में भाग लेने का अधिकार होगा, चर्चा करने का भी अधिकार होगा किन्तु किसी भी प्रस्ताव मे मतदान का अधिकार मनोनीत सभासदों को नहीं होगा, जबकि लोकतान्त्रिक प्रक्रिया मे आपकी बात का वजन आपकी वोट पर निर्भर करता है और आज देश मे मताधिकार हेतु SIR विशेष गहन परीक्षण को लेकर पिछले 6 महीने से चल रही मारामारी - आपाधापी इसका पुख्ता सबूत है. ऐसे मे भले ही ये मनोनीत सभासद नगरपालिकाओं मे राज्य सरकार द्वारा मनोनीत का दर्जा पाकर सम्मानित भले ही कहलाएंगे किन्तु न तो इनसे बोर्ड को कोई मजबूती मिल सकेगी और न ही नगर के विकास कार्यों में इनकी कोई सहभागिता हो सकेगी क्योंकि जिसकी लाठी उसकी भैंस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में वजन रखने के लिए पहली और आखिरी शर्त है. 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 



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