ग्राम न्यायालय को भरण पोषण मामले तय करने का अधिकार-इलाहाबाद हाई कोर्ट



इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया कि

 ग्राम न्यायालयों को भरण-पोषण से जुड़े मामलों की सुनवाई और निष्पादन करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 से 128 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 से 147 के तहत आने वाले मामलों पर भी ग्राम न्यायालय निर्णय ले सकते हैं।

जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने यह टिप्पणी एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें उसने अपने भरण-पोषण आदेश के क्रियान्वयन के लिए लंबित प्रार्थना पत्र के शीघ्र निस्तारण की मांग की थी।

मामले के अनुसार 

महिला ने वर्ष 2018 में भरण-पोषण के लिए आवेदन किया, जिस पर 30 नवंबर 2024 को ग्राम न्यायालय के न्यायाधिकारी ने उसके पक्ष में आदेश दिया। इसके बाद महिला ने उसी न्यायालय में BNSS की धारा 147 के तहत आदेश के क्रियान्वयन के लिए याचिका दाखिल की, जो लंबित है।

हाईकोर्ट ने कहा कि 

भरण-पोषण से जुड़े मामलों के लिए दो कानून प्रावधान करते हैं, फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 और ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008। अदालत ने विशेष रूप से ग्राम न्यायालय अधिनियम की धारा 12 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत ग्राम न्यायालय को उन मामलों की सुनवाई का अधिकार है, जो इसके प्रथम अनुसूची के भाग-द्वितीय में शामिल हैं।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि

 इस अनुसूची में CrPC के अध्याय 9 (अब BNSS के अध्याय 10) से जुड़े भरण-पोषण के मामलों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया, जो पत्नी बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण से संबंधित हैं।

इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि ग्राम न्यायालय के पास महिला की लंबित निष्पादन याचिका पर निर्णय लेने का पूरा अधिकार है।

अंततः अदालत ने संबंधित न्यायाधिकारी को निर्देश दिया कि वह महिला की याचिका का निस्तारण कानून के अनुसार यथाशीघ्र करें और संभव हो तो छह माह के भीतर फैसला सुनाएं।

प्रस्तुति

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट

कैराना (शामली) 

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