क्या खतना मुस्लिम महिलाओं की धार्मिक आजादी है - तीखी बहस सुप्रीम कोर्ट



मुस्लिम समुदाय मे एक शब्द प्रचलित है - खतना, जिसे अंग्रेजी में  (Female Genital Mutilation - FGM) कहते हैं FGM का मतलब फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (Female Genital Mutilation - FGM) है, और हिंदी में 'विस्तार में इसे महिला जननांग विकृति' या 'महिला खतना' कहा जाता है। यह एक अत्यंत हानिकारक प्रथा है।

➡️ प्रक्रिया

 इसमें गैर-चिकित्सीय कारणों से महिलाओं या छोटी बच्चियों के बाहरी जननांगों को आंशिक या पूरी तरह से काट दिया जाता है या उन्हें अन्य प्रकार से चोट पहुँचाई जाती है 

➡️ आयु

यह आमतौर पर बचपन से लेकर 15 वर्ष की आयु तक की लड़कियों पर की जाती है।

➡️ स्वास्थ्य प्रभाव: 

इसका कोई स्वास्थ्य लाभ नहीं है, बल्कि यह बेहद दर्दनाक होती है। इससे गंभीर रक्तस्राव, संक्रमण, प्रसव में जटिलताएं और मानसिक आघात जैसी आजीवन समस्याएं हो सकती हैं।

➡️ मानवाधिकार उल्लंघन: 

संयुक्त राष्ट्र (UN) इसे लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन मानता है।

वैश्विक स्थिति: यह अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के कुछ हिस्सों में प्रचलित है। वर्तमान में, विश्व स्तर पर 23 करोड़ से अधिक महिलाओं और लड़कियों पर यह अत्याचार किया जा चुका है।इसे रोकने के लिए कई देशों में कानूनन इसे अपराध घोषित किया गया है. 

      अब भारत में भी इसे लेकर बहस छिड़ गई है। एक पक्ष इसे मुस्लिम महिलाओं के गरिमा से जीने के अधिकार का उल्लंघन बता रहा है और दूसरा पक्ष इसे मुस्लिम धार्मिक आस्था का अभिन्न अंग बता रहा है, ऐसे में इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ (जिसमें जस्टिस नागरत्ना, सुंदरेश, अमनुल्लाह, कुमार, मसीह, वराले, महादेवन और बागची शामिल हैं) का गठन किया गया है. 

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा पर तीखी बहस छिड़ गई है. जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दाऊदी बोहरा समुदाय के कुछ वर्गों में प्रचलित फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा को लेकर मौखिक रूप से चिंता जताई.

बहस में याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह प्रथा महिलाओं के गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है किन्तु इस प्रथा के समर्थकों का कहना है कि यह उनकी धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है और उन्हें अनुच्छेद 25 के तहत इसे जारी रखने का अधिकार है.

एक पक्ष के अनुसार प्रथा को महिलाओं के लिए गरिमा के साथ जीने का उल्लंघन कहने और दूसरे पक्ष द्वारा धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा कहने से यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने संवेदनशील मुद्दा बन गया है क्योंकि एक तरफ अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता है तो दूसरी तरफ मानवीय गरिमा, स्वास्थ्य और महिलाओं की यौन स्वायत्तता.

FGM अर्थात महिला खतना की प्रथा का का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने बेंच के सामने तर्क रखते हुए कहा कि 

यह प्रथा 7 साल की छोटी बच्चियों पर की जाती है और इससे उनके शरीर में ऐसा बदलाव आता है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता, जिसका असर उनकी यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ता है....... कई परिवार इस प्रथा का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि अगर वे इसका पालन नहीं करेंगे तो उन्हें समाज से निकाल दिया जाएगा........ इस प्रथा को अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता और इसलिए इसे अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए. 

वहीं, जस्टिस जॉयमाल्य बागची की टिप्पणी  प्रस्तुत मामले में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, जिसमें उन्होंने कहा कि 

  "इस प्रथा को रोकने के लिए शायद बहुत जटिल संवैधानिक व्याख्याओं की जरूरत ही न पड़े क्योंकि इस प्रथा पर आर्टिकल 25 के तहत स्वास्थ्य के आधार पर ही रोक लगाई जा सकती है....... संविधान का अनुच्छेद 25, जो धार्मिक स्वतंत्रता देता है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के दायरे में ही मिलेगी..... जहां तक महिलाओं के खतना (FGM) का सवाल है, हमें शायद दूसरे अधिकारों पर विचार करने की भी जरूरत न पड़े. इसके लिए सिर्फ स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य शब्द ही काफी हो सकते हैं...... इस प्रथा का पालन न करने पर समाज से बहिष्कृत किए जाने के परिणामों के साथ-साथ इस धार्मिक प्रथा का किसी व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक समग्रता पर पड़ने वाले प्रभाव की भी जांच किए जाने की जरूरत है."

   जिसका समर्थन करते हुए एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि

 इस प्रथा में क्लिटोरिस के आस-पास की त्वचा को हटा दिया जाता है जिससे कम से कम 10,000 तंत्रिका-सिरों (nerve endings) को ऐसा नुकसान पहुंचता है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती...... यह महिलाओं के शरीर के एक बहुत जरूरी अंग को काटना है और इसका सीधा असर उनकी शारीरिक, प्रजनन और भावनात्मक सेहत पर पड़ता है. जहां कोई प्रथा किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता में दखल देती है और किसी जरूरी अंग को नुकसान पहुंचाती है तो वह अनिवार्य रूप से अनुच्छेद 25 और 26 के तहत तय सीमाओं यानी सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन करती है. 

      एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा के अनुसार 59 देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है. 

    पीठ की माननीय जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि 

यह प्रथा अनुच्छेद 25 के तहत नैतिकता के आधार पर भी सवालों के घेरे में आएगी

न्यायमूर्ति वराले ने इसके प्रभाव को कई गुना बताते हुए चिंता व्यक्त की जबकि न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि

 इस प्रथा का मूल उद्देश्य महिलाओं की कामुकता (sexuality) को नियंत्रित करना था.

तब सीनियर एडवोकेट लूथरा ने पीठ से अपील की कि 

बेंच को समुदाय के भीतर काम करने वाले ढांचे (power structures) और उन सामाजिक मजबूरियों पर भी विचार करना चाहिए जिनका सामना लोगों को करना पड़ता है.

इस पर माननीय मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि

 क्या लूथरा यह सुझाव दे रहे हैं कि अगर कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति के अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है तो अनुच्छेद 25 और 26 के बावजूद कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए 

जिसका जवाब में लूथरा ने "हां" कहा. उन्होंने इस बात पर खास जोर दिया कि 

इस प्रथा का शिकार होने वाले लोग नाबालिग हैं जो कानूनी रूप से सहमति देने में असमर्थ हैं. 

याचिका के विरोध में आए अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि यह कोई विकृति नहीं है बल्कि इसे पश्चिम में होने वाली हुडेक्टॉमी (hoodectomy) की तरह एक प्रक्रिया माना जाना चाहिए इसके साथ ही पाशा ने इस प्रथा की तुलना पुरुषों के खतना से की, जिस पर न्यायमूर्ति बागची ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इसकी तुलना पुरुषों के खतना से करना गलत है. सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधार पर पुरुषों के सरकमसीजन और फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (mutilation) में बड़ा अंतर है. 

याचिका के विरोध में अधिवक्ता निजाम पाशा ने हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि

 फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) का पालन न करने की स्थिति में किसी भी सदस्य को समुदाय से निष्कासित नहीं किया जाता.

 उन्होंने इस प्रक्रिया को अंग-भंग (mutilation) के रूप में परिभाषित किए जाने पर भी कड़ा विरोध जताया.

किन्तु यह स्वीकार किया कि 

यह एक तथ्यात्मक पहलू है जिस पर अलग से विचार किया जाएगा.... समुदाय के भीतर इस प्रथा को न अपनाने के कोई सांसारिक या सामाजिक दुष्परिणाम नहीं हैं. भले ही व्यक्तिगत रूप से कुछ सदस्यों की यह आध्यात्मिक मान्यता हो सकती है कि इसके कुछ धार्मिक परिणाम हो सकते हैं.

न्यायमूर्ति बागची के इस सवाल पर कि 

क्या दाऊदी बोहरा धर्मगुरु के निर्देशों का पालन न करने पर किसी प्रकार की सजा दी जाती है.

  जिस पर तर्क रखते हुए अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि 

इसका कोई सामाजिक या व्यावहारिक परिणाम नहीं होता....... जैसे नमाज अनिवार्य होने के बावजूद उसे न पढ़ने पर कोई सजा नहीं मिलती, वैसे ही इस प्रथा का पालन न करने पर भी समुदाय से बाहर निकालने (बहिष्कार) का कोई प्रावधान नहीं है........ दाऊदी बोहरा धर्म में इस प्रथा को न मानने पर न तो कोई धार्मिक प्रतिबंध है और न ही बहिष्कार का डर.

 जब न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस प्रथा के उद्देश्य के बारे में पूछा, तो पाशा ने उत्तर दिया कि 

इसका मकसद महिलाओं के यौन सुख (सेक्सुअल प्लेजर) को बढ़ाना है.

 इस तर्क पर न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने हैरानी जताते हुए कहा कि यह तो दावे के बिल्कुल विपरीत है. न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने पाशा द्वारा इसकी तुलना पुरुषों के खतना से करने पर कड़ी आपत्ति जताई और उन्हें तथ्यों को सुधारने की सलाह दी. उन्होंने स्पष्ट किया कि

 भले ही इस प्रथा को न मानने पर बहिष्कार न किया जाता हो, लेकिन चूंकि इसे एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा माना जाता है इसलिए अदालत के लिए इसकी गहन जांच करना आवश्यक है.

प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 


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