वकील के लिए मुवक्किल की स्पष्ट लिखित अनुमति आवश्यक-सुप्रीम कोर्ट



यह महत्वपूर्ण फैसला 'कृष्णा कुमार ओझा और अन्य बनाम जितेंद्र चौधरी और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया है।

इस मामले से जुड़ी मुख्य जानकारियां और पक्षकारों का विवरण निम्नलिखित है:

वादकारी (पार्टियां): 

यह मामला मूल रूप से 1989 के एक संपत्ति और विभाजन विवाद से जुड़ा है, जिसमें मूल वादियों (Plaintiffs) के कानूनी वारिस अपीलकर्ता थे और दूसरे पक्ष के रूप में जितेंद्र चौधरी व अन्य प्रतिवादी थे।

मामले की पृष्ठभूमि: 

1989 में संपत्ति के बंटवारे को लेकर मुकदमा शुरू हुआ था। निचली अदालत और पटना हाईकोर्ट ने एक 28 साल पुरानी समझौता डिक्री (Compromise decree) को रद्द कर दिया था, जिसके खिलाफ वादियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: 

सुप्रीम कोर्ट (न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ) ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

⚫ तथ्य

समझौता केवल वकील के हस्ताक्षर या सहमति के आधार पर किया गया था, जिसमें पक्षकारों (Clients) की स्पष्ट लिखित अनुमति या हस्ताक्षर नहीं थे।

फैसले का आधार: 

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 23 नियम 3 के तहत किसी भी समझौते के लिए पक्षकारों का स्वयं हस्ताक्षर करना अनिवार्य है और वकील बिना स्पष्ट लिखित अनुमति के अपने मुवक्किल के संपत्ति अधिकारों से समझौता नहीं कर सकता।

द्वारा 
शालिनी कौशिक 
एडवोकेट 
कैराना (शामली) 

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