संदेश

जुलाई, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बंदरों के आतंक और मानव बन्दर संघर्ष पर इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त

चित्र
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बंदरों के बढ़ते आतंक और मानव-बंदर संघर्ष पर सख्त रुख अपनाते हुए हाल ही में राज्य सरकार द्वारा गठित 13 सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी को केवल कागजों तक सीमित न रहकर तत्काल और प्रभावी कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।अदालत ने कहा कि समिति नियमित बैठकें करें और सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे. ➡️ कोर्ट के मुख्य निर्देश और अपडेट ⚫ मुख्य पक्षकार (Parties Involved) ⚫ याचिकाकर्ता (Petitioners):  विनीत शर्मा और प्रजाक्ता सिंहल, जिनकी ओर से वकील पवन कुमार तिवारी और आकाश वशिष्ठ पैरवी कर रहे हैं। ⚫ प्रतिवादी/विपक्षी (Respondents):  उत्तर प्रदेश सरकार (अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल), नगर निकाय, वन विभाग और अन्य संबंधित अधिकारी। ⚫ कमेटी की सक्रियता:  अदालत ने स्पष्ट किया कि 15 जुलाई 2026 को गठित 13 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति नियमित बैठकें करे और याचिकाकर्ताओं द्वारा सुझाई गई कार्ययोजना पर जल्द से जल्द ठोस निर्णय ले। ⚫ कार्रवाई रिपोर्ट तलब:  कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अगली सुनवाई पर समिति की बैठकों की कार्यवाही (मिनट्स) और अब तक हुई प...

मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को रोकते हुए तमिलनाडु में जारी रहेगी गो-हत्या: सुप्रीम कोर्ट

चित्र
  सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें बकरीद या किसी भी अन्य दिन तमिलनाडु राज्य में कहीं भी गाय या बछड़े की हत्या पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने तमिलनाडु राज्य द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। राज्य ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें राज्य में गायों और बछड़ों की हत्या पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई।  Case : The Secretary to the Government v. K Surya alias K Surya Prasanth | Diary No.36054/2026 द्वारा  शालिनी कौशिक  एडवोकेट  कैराना (शामली) 

पत्नी पति की 25% नेट सैलरी की हर बार हकदार नहीं-इलाहाबाद हाई कोर्ट)

चित्र
 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुज़ारा-भत्ते (मेंटेनेंस) को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि  पत्नी को पति की नेट सैलरी का 25% देना कोई तय नियम नहीं, बल्कि यह केवल एक सामान्य गाइडलाइन है। हर मामले में पति-पत्नी की आय, आर्थिक स्थिति, ज़रूरतों और परिस्थितियों के आधार पर भरण-पोषण की राशि तय की जानी चाहिए ।  इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि  तलाक के बाद भी यदि पत्नी ने दोबारा शादी नहीं की है और वह अपना गुज़ारा करने में सक्षम नहीं है, तो उसे मेंटेनेंस पाने का अधिकार बना रहता है। यह टिप्पणी कानपुर देहात के एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जहां फैमिली कोर्ट ने महिला को ₹12,000 मासिक गुज़ारा-भत्ता दिया था। हाई कोर्ट ने पाया कि पति की वास्तविक आय और महंगाई को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया था, जिसके बाद महिला का मासिक मेंटेनेंस ₹12,000 से बढ़ाकर ₹20,000 कर दिया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी को पति की नेट सैलरी का 25% हिस्सा गुजारा भत्ते (मेंटेनेंस) के रूप में देना कोई अनिवार्य नियम नहीं है। यह प्रतिशत केवल एक सामान्य दिशा-निर्देश (गाइडलाइन) है, और अदालतें दोनो...

विवादित जगह के पास जुमे की नमाज़ की इजाज़त-सुप्रीम कोर्ट

चित्र
  मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि  मामले का अंतिम फैसला होने तक मुस्लिम पक्ष को विवादित परिसर से सटी अलग खुली जगह पर हर शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच नमाज अदा करने की व्यवस्था की जाए किन्तु यह केवल अंतरिम व्यवस्था होगी और इससे मामले के अंतिम निर्णय पर कोई असर नहीं पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला मामले में निर्देश दिया है कि अंतिम फैसला आने तक मुस्लिम समुदाय को परिसर के अंदर नहीं, बल्कि उसके बाहर या उससे सटे किसी अलग खुले स्थान पर जुमे (शुक्रवार) की नमाज अदा करने की व्यवस्था की जाए。 शीर्ष अदालत ने यह अंतरिम आदेश मुस्लिम पक्ष द्वारा दायर की गई उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया है, जिसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें विवादित परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर घोषित किया गया था。 सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: ⚫ नमाज़ के लिए समय: यह अनुमति केवल शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे ...

अगर पति पत्नि की तरह साथ रहे हैं तो भरण पोषण भी देना होगा - इलाहाबाद हाई कोर्ट

  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि  यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनका वैवाहिक संबंध अन्य परिस्थितियों से स्थापित होता हो, तो भरण-पोषण (Maintenance) के दावे को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वैध विवाह का सख्त दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस प्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों, तो पुरुष भरण-पोषण (Maintenance) देने से इनकार नहीं कर सकता। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में भरण-पोषण के दावे को केवल वैध विवाह के ठोस दस्तावेजी प्रमाण न होने के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। ⚫ केस की डिटेल्स और महत्वपूर्ण बिंदु: पार्टीज के नाम: यह फैसला संतोष कुमार (पति) और उनकी पत्नी/महिला (चित्रकूट) के बीच के मामले में जस्टिस अचल सचदेव की बेंच द्वारा दिया गया। ⚫ तथ्य: महिला ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी कि 2017 में कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन के बाद वह पति के साथ रहने लगी थी, जिससे एक पुत्र भी हुआ। लेकिन फैमिली कोर्ट ने सख्त दस्तावेज (Marriage Certificate) न हो...

"लिव-इन में रह रही बेटी पिता से भरण-पोषण की हकदार नहीं - छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

चित्र
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही बेटी द्वारा पिता से भरण-पोषण मांगने के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि  अगर कोई लड़की माता-पिता की मर्जी के खिलाफ अपने प्रेमी के साथ लिव-इन में रह रही है, तो उसे पिता से भरण-पोषण मांगने का कोई अधिकार नहीं है।  इसी आधार पर कोर्ट ने रायपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें पिता को हर महीने पांच हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया था।  मामले के मुताबिक, रायपुर निवासी 24 वर्षीय अविवाहित युवती बिना किसी ठोस कारण के अपने परिवार से अलग रह रही है। पिता ने याचिका में बताया कि वह पेशे से ड्राइवर हैं, मासिक अड़तीस हजार रुपये कमाते हैं, और उनके अन्य बच्चे भी पढ़ाई कर रहे हैं जिनकी जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है।  पिता का कहना था कि बेटी उनकी मर्जी के खिलाफ प्रेमी के साथ लिव-इन में रहती है, इसलिए उससे उनका कोई संबंध नहीं बनता। हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों और तर्कों पर विचार करते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश खारिज कर दिया और पिता के पक्ष को स्वीकार किया.  प्रस्तुति  शालिनी कौशिक  एडवोकेट...

तलाक के बाद भी घरेलू हिंसा की कार्यवाही रद्द नहीं-इलाहाबाद हाईकोर्ट

चित्र
 इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस बृज राज सिंह ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि  शादी के बाद हुआ तलाक का फैसला पति को विवाह के दौरान की गई घरेलू हिंसा के दायित्वों से मुक्त नहीं करता है। पति द्वारा घरेलू हिंसा की कार्यवाही को रद्द करने के लिए दायर याचिका को खारिज करते हुए एकल पीठ के जस्टिस बृज राज सिंह ने माना कि पत्नी अभी भी घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा और लाभ का दावा करने की हकदार है, क्योंकि यह कानून उन पुराने घरेलू संबंधों को भी शामिल करता है जहां दोनों पक्ष किसी भी समय एक साझा घर में साथ रहे हों। इस प्रकार इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादी के दौरान हुई घरेलू हिंसा के लिए पति की जिम्मेदारी तलाक की डिक्री (Decree of divorce) मिलने के बाद भी खत्म नहीं होती है。तलाक के बाद भी पत्नी घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा और राहत पाने की हकदार है。 ➡️ मामले का शीर्षक:  पुनीत रस्तोगी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, गृह विभाग के प्रमुख सचिव के माध्यम से, लखनऊ और अन्य वाद संख्याः एप्...

बिक्री विलेख पंजीकरण के लिए क्रेता-विक्रेता दोनों की व्यक्तिगत मौजूदगी अनिवार्य नही-इलाहाबाद हाई कोर्ट

चित्र
  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि उत्तर प्रदेश में बिक्री विलेख (Sale Deed) के पंजीकरण के लिए क्रेता और विक्रेता दोनों की एक साथ व्यक्तिगत मौजूदगी अनिवार्य नहीं है。  अदालत ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश में लागू पंजीकरण अधिनियम की धारा 32A केंद्रीय कानून से अलग है。 ⚫ निर्णय के पक्षकारों के नाम: यह ऐतिहासिक फैसला मीमांसा नांगिया एवं अन्य (क्रेता पक्ष) बनाम शिवानी हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड (विक्रेता पक्ष) मामले में सुनाया गया。 ⚫ निर्णय से जुड़ी मुख्य बातें: ✒️ वैकल्पिक उपस्थिति : यदि क्रेता या विक्रेता अपनी शारीरिक उपस्थिति दर्ज कराने में असमर्थ हैं, तो दस्तावेज का निष्पादन और पंजीकरण फिर भी वैध होगा。 ✒️ अनिवार्य शर्त: यदि विक्रेता (या उनके कानूनी उत्तराधिकारी) संपत्ति को फ्रीहोल्ड (Freehold) में बदलने का अपना दायित्व पूरा करते हैं और क्रेता अपनी पूरी राशि देने के लिए तैयार रहता है, तो अदालत क्रेता के पक्ष में डिक्री (Specific Performance) लागू कर सकती है。 ⚫ पंजीकरण अधिनियम, 1908 ( Registration Act, 1908) की धारा 32-क (Section 32-A) के तहत संपत्ति की रजिस्ट्री या किस...

केवल अनुबन्ध नहीं है हिन्दू विवाह, नोटरी मह्त्वहीन - मध्य प्रदेश हाई कोर्ट

चित्र
  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि  हिंदू विवाह को न तो केवल नोटरी कृत समझौते के आधार पर संपन्न माना जा सकता है और न ही ऐसे समझौते के जरिए वैध रूप से समाप्त किया जा सकता है। हिंदू कानून के तहत विवाह कोई अनुबंध नहीं है, इसलिए केवल नोटरीकृत विवाह समझौते से वैध विवाह नहीं माना जाएगा।  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह कोई कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) नहीं, बल्कि एक अटूट संस्कार है। इसलिए, केवल स्टाम्प पेपर पर नोटरी द्वारा प्रमाणित (Notarized) अनुबंध के जरिए न तो कोई हिंदू विवाह वैध माना जा सकता है और न ही उसे कानूनी रूप से समाप्त (तलाक) किया जा सकता है। ⚫ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इस महत्वपूर्ण निर्णय (जहाँ अदालत ने कहा था कि हिंदू विवाह कोई अनुबंध नहीं है और नोटरी द्वारा तलाक या विवाह वैध नहीं है) में मुख्य याचिकाकर्ता राम कृपाल सिंह थे और प्रतिवादी मध्य प्रदेश राज्य (राज्य सरकार) थी | ➡️ मूल तथ्य और पक्षकार (Parties) इस प्रकार हैं: ⚫ अपीलकर्ता /याचिकाकर्ता: राम कृपाल सिंह (इन्होंने deceased/मृतक महिला सुमन बाई के पति होने का दावा किया ...

पति के लगातार दबाव में महिला का पति की संपत्ति मे हिस्सा माँगना भी दहेज की मांग - कलकत्ता हाई कोर्ट

चित्र
  कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि " किसी महिला को अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का कानूनी अधिकार है, लेकिन यदि वह मांग पति के लगातार दबाव, उत्पीड़न या मजबूरी में की गई हो, तो उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304बी के तहत दहेज की मांग माना जा सकता है।" ➡️ कलकत्ता हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय -  ⚫ केस का नाम: सजल पारुई बनाम पश्चिम बंगाल राज्य ✒️ मुख्य पक्षकार (Parties) निम्नलिखित थे: ⚫ अपीलकर्ता/दोषी (Appellants/Convict):  मुख्य आरोपी सजल पारुई (पति) था। इसके अलावा सजल के पिता (हरेन्द्र चंद्र पारुई) और मां (रीना पारुई) भी अपीलकर्ता थे। ⚫ प्रतिवादी/शिकायतकर्ता (Respondent/Complainant):  मृतका (पीड़िता) का भाई (जिसने पहली बार FIR दर्ज कराई थी) और पश्चिम बंगाल राज्य इस मामले में प्रतिवादी थे। कलकत्ता हाई कोर्ट की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि भले ही एक महिला को पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का कानूनी अधिकार है, लेकिन यदि यह मांग पति के लगातार दबाव और उत्पीड़न के कारण की गई हो, तो इसे 'दहेज की मांग' माना जा सकता है। द्वारा  शालिन...

वकील के लिए मुवक्किल की स्पष्ट लिखित अनुमति आवश्यक-सुप्रीम कोर्ट

चित्र
यह महत्वपूर्ण फैसला ' कृष्णा कुमार ओझा और अन्य बनाम जितेंद्र चौधरी और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया है। इस मामले से जुड़ी मुख्य जानकारियां और पक्षकारों का विवरण निम्नलिखित है: ⚫ वादकारी (पार्टियां):  यह मामला मूल रूप से 1989 के एक संपत्ति और विभाजन विवाद से जुड़ा है, जिसमें मूल वादियों (Plaintiffs) के कानूनी वारिस अपीलकर्ता थे और दूसरे पक्ष के रूप में जितेंद्र चौधरी व अन्य प्रतिवादी थे। ⚫ मामले की पृष्ठभूमि:  1989 में संपत्ति के बंटवारे को लेकर मुकदमा शुरू हुआ था। निचली अदालत और पटना हाईकोर्ट ने एक 28 साल पुरानी समझौता डिक्री (Compromise decree) को रद्द कर दिया था, जिसके खिलाफ वादियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। ⚫ सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:  सुप्रीम कोर्ट (न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ) ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। ⚫ तथ्य :  समझौता केवल वकील के हस्ताक्षर या सहमति के आधार पर किया गया था, जिसमें पक्षकारों (Clients) की स्पष्ट लिखित अनुमति या हस्ताक्षर नहीं थे। ⚫ फैसले का आधार:  सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कि...

लव जिहाद में भी भरण पोषण-मध्य प्रदेश हाई कोर्ट

चित्र
  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और बाद में उत्पीड़न से जुड़े एक 'लव जिहाद' मामले में जून 2026 में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।  इस प्रकरण में शामिल मुख्य पक्षों के नाम निम्नलिखित हैं: याचिकाकर्ता (पीड़िता/पत्नी): एक हिंदू महिला प्रतिवादी (पति): मुस्तफा बोहरा उर्फ गब्बर (बोहरा मुस्लिम समुदाय ) मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर बेंच) के इस मामले में पीड़ित महिला (पत्नी) और उनकी नाबालिग बेटी याचिकाकर्ता (याचिकाकर्ता 1 और 2) हैं, और महिला के पति (एक मुस्लिम व्यक्ति जो हिंदू बनकर रहा था) इस मामले में प्रतिवादी (Respondent) हैं। अदालत की गोपनीयता बनाए रखने के लिए कानूनी दस्तावेजों में उनका नाम गुप्त रखा गया है। मामले से जुड़े मुख्य पक्ष और तथ्य: याचिकाकर्ता (पीड़िता और उसकी बेटी): पत्नी ने आरोप लगाया था कि 23 फरवरी 2020 को कोरोना लॉकडाउन के दौरान एक मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह किया था। पति ने खुद को हिंदू बताया था। बाद में गर्भावस्था के दौरान महिला को पता चला कि उसका पति एक मुस्लिम व्यक्ति था (कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में उसका नाम 'गब्बर उर्फ ...