उपाध्याय समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर भी रामभद्राचार्य पर FIR नहीं-इलाहाबाद हाई कोर्ट

 


जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा उपाध्याय, चौबे, पाठक और दीक्षित जैसी ब्राह्मण उपजातियों/समुदायों के संदर्भ में 'नीच' या 'अधम' जैसे शब्दों का उपयोग करने, साथ ही चारों शंकराचार्यों के खिलाफ भी आपत्तिजनक टिप्पणी के आरोप पर याचिकाकर्ता रमेश उपाध्याय एडवोकेट द्वारा FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। 

➡️  विवाद और कानूनी केस की मुख्य बातें :

⚫ . विवाद का मुख्य कारण (विवादित बयान)

सोशल मीडिया और यूट्यूब पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य का एक बयान/वीडियो प्रसारित हुआ था। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस वीडियो में उन्होंने उपाध्याय, चौबे, पाठक और दीक्षित जैसी ब्राह्मण उपजातियों/समुदायों के संदर्भ में 'नीच' या 'अधम' जैसे शब्दों का उपयोग किया था। इसके साथ ही उन पर चारों शंकराचार्यों के खिलाफ भी आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगा। इन बयानों से उपाध्याय समुदाय के लोगों की भावनाएं आहत हुईं और उन्होंने इसे समाज का अपमान माना।

⚫ . रामभद्राचार्य का स्पष्टीकरण

विवाद बढ़ने पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने वृंदावन में इस पर अपना स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि उनके पुराने वक्तव्य को संदर्भ से अलग हटाकर पेश किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्राचीन नियमों के अनुसार, विद्यार्थियों से धन (फीस या ट्यूशन) लेकर शिक्षा देने वालों को 'अधम' या निम्न श्रेणी का माना जाता था, क्योंकि शिक्षा मुफ्त में देना उत्तम परंपरा थी। उन्होंने किसी जाति विशेष को निशाना नहीं बनाया, बल्कि व्यावसायिक शिक्षा देने की प्रवृत्ति पर टिप्पणी की थी। 

⚫ . कोर्ट में क्या हुआ (कानूनी केस)?

याचिकाकर्ता: वाराणसी के रहने वाले रमेश उपाध्याय (जो पेशे से अधिवक्ता हैं) ने इस बयान के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने पहले वाराणसी पुलिस कमिश्नर को शिकायत दी और कार्रवाई न होने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक आपराधिक रिट याचिका दायर कर रामभद्राचार्य के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की।

हाई कोर्ट का फैसला: न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने इस याचिका को सुनवाई के योग्य न मानते हुए (मेरिट से रहित) खारिज कर दिया।

 ⚫ हाई कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?

अदालत ने कहा कि यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती है, तो सीधे हाई कोर्ट आने के बजाय पीड़ित व्यक्ति को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत संबंधित क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट से संपर्क करना चाहिए। मजिस्ट्रेट के पास जांच के आदेश देने और FIR दर्ज कराने का पूरा अधिकार है। कानूनी प्रक्रिया और तय वैधानिक उपायों को बाईपास करके सीधे हाई कोर्ट आना स्वीकार्य नहीं है। 

⚫ वर्तमान स्थिति

हालांकि हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है, लेकिन कोर्ट ने याचिकाकर्ता रमेश उपाध्याय को यह स्वतंत्रता दी है कि वे चाहें तो कानून के दायरे में रहकर उचित निचली अदालत या मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

द्वारा

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

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