तलाक के बाद भी घरेलू हिंसा की कार्यवाही रद्द नहीं-इलाहाबाद हाईकोर्ट


 इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस बृज राज सिंह ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि 

शादी के बाद हुआ तलाक का फैसला पति को विवाह के दौरान की गई घरेलू हिंसा के दायित्वों से मुक्त नहीं करता है। पति द्वारा घरेलू हिंसा की कार्यवाही को रद्द करने के लिए दायर याचिका को खारिज करते हुए एकल पीठ के जस्टिस बृज राज सिंह ने माना कि पत्नी अभी भी घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा और लाभ का दावा करने की हकदार है, क्योंकि यह कानून उन पुराने घरेलू संबंधों को भी शामिल करता है जहां दोनों पक्ष किसी भी समय एक साझा घर में साथ रहे हों।

इस प्रकार इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादी के दौरान हुई घरेलू हिंसा के लिए पति की जिम्मेदारी तलाक की डिक्री (Decree of divorce) मिलने के बाद भी खत्म नहीं होती है。तलाक के बाद भी पत्नी घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा और राहत पाने की हकदार है。

➡️ मामले का शीर्षक: 

पुनीत रस्तोगी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, गृह विभाग के प्रमुख सचिव के माध्यम से, लखनऊ और अन्य

वाद संख्याः एप्लीकेशन यू/एस 482 संख्या 6580/2025

पीठः जस्टिस बृज राज सिंह

निर्णय की तिथि: 7 जुलाई 2026

➡️ इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय के मुख्य बिंदु:

पिछली घटनाओं पर मुकदमा: यदि महिला के साथ शादीशुदा जीवन के दौरान घरेलू हिंसा हुई है, तो बाद में तलाक हो जाने पर भी पति को आरोपों से छूट नहीं मिलेगी और उस पर केस चलता रहेगा。

साझा घरेलू संबंध की परिभाषा: घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2(s) के तहत 'घरेलू संबंध' केवल वर्तमान में साथ रह रहे पति-पत्नी तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों पर भी लागू होता है जो अतीत में कभी एक साथ साझा घर में रहे हों。

तलाक का आधार अलग: अदालत ने माना कि यदि पति को क्रूरता के आधार पर तलाक मिल भी गया है, तो भी इसका मतलब यह नहीं है कि पत्नी घरेलू हिंसा का दावा नहीं कर सकती。न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों में साक्ष्यों के आधार पर जांच आवश्यक होती है और केवल तलाक की डिक्री को आधार बनाकर घरेलू हिंसा की कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता。

यह निर्णय जस्टिस बृज राज सिंह की एकल पीठ द्वारा एक पति की उस याचिका को खारिज करते हुए सुनाया गया था, जिसमें उसने तलाक के बाद पत्नी द्वारा दर्ज कराए गए घरेलू हिंसा के मामले को रद्द करने की मांग की थी。

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 


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