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YOUR PROPERTY:YOUR DUTY

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हमारे घर के पास अभी हाल ही में एक मकान बना है .अभी तो उसकी पुताई का काम होकर निबटा ही था कि क्या देखती हूँ कि उस पर एक किसी ''शादी विवाह ,पैम्फलेट आदि बनाना के विज्ञापन चिपक गया .बहुत अफ़सोस हो रहा था कि आखिर लोग मानते क्यों नहीं ?क्यूं नई दीवार पर पोस्टर लगाकर उसे गन्दा कर देते हैं ? यही नहीं हमारे घर से कुछ दूर एक आटा चक्की है और जब वह चलती है तो उसके चलने से आस-पास के सभी घरों में कुछ हिलने जैसा महसूस होता है .मुझे ये भी लगता है कि जब हमारे घर के पास रूकती कोई कार हमारे सिर में दर्द कर देती है तब क्या चक्की का चलना आस-पास वालों के लिए सिर दर्द नहीं है ?फिर वे क्यूं कोई कार्यवाही नहीं करते ? मेरे इन सभी प्रश्नों के उत्तर मेरी बहन मुझे देती है कि पहले तो लोग जानते ही नहीं कि उनके इस सम्बन्ध में भी कोई अधिकार हैं और दूसरे  ये कि लोग कानूनी कार्यवाही के चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहते क्योंकि ये बहुत लम्बी व् खर्चीली हैं किन्तु ये तो समस्या का समाधान नहीं है इस तरह तो हम हर जगह अपने को झुकने पर मजबूर कर देते हैं और चलिए थोड़ी देर कोई मशीनरी चलनी हो तो बर्दाश्त की जा सकती है किन्...

पट्टा-लाइसेंस और मानस जायसवाल

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    मेरी पिछली पोस्ट '' पारिवारिक निपटान आलेख और मानस जायसवाल  ''में मानस जायसवाल जी ने एक प्रश्न और पूछा था ,जो कुछ इस प्रकार था - धन्यवाद शालिनी जी, अभी भी एक सवाल बाकी है | अपने वाद के अनुसार पूछता हूँ| पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए 3 भाई एक नए शहर में बस गए| उन्होंने खुली नीलामी में अलग अलग कई संपतियां प्राप्त की, जो सभी 33x3 वर्ष की लीज पर प्राप्त हुई| इनमें से 2 भाइयों ने साझे नाम से भी 2-3 संपतियां प्राप्त की| अधिकतर प्लाट इन्होने शुरू के 12-15 सालों में विक्रय कर दिए|  इन दो भाइयों में से एक ने अपने तन्हा नाम से प्राप्त एक प्लाट में अपने परिवार के साथ रिहाईश शुरू की, और दुसरे को भी उसके एक भाग में रहने के लिए बुला लिया (जिसे लाइसेंस का नाम दिया गया) | दुसरे भाई की मृत्यु १९७३ में हो गई (पर उसकी विधवा के नाम लाइसेंस जारी रहा) और उसके बाद २०१५ तक जारी रहा| इस बीच पहले भाई, दुसरे भाई की पत्नी और उसके पुत्रों की भी मृत्यु हो चुकी थी (लेकिन लाइसेंस जारी रहा)|  उक्त प्लाट की पहले ३३ वर्ष की लीज 1989 में समाप्त होने बाद दोबारा नहीं बड़ी| २०१२ में सरकार की...

पारिवारिक निपटान आलेख और मानस जायसवाल

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पूर्व आलेख  ' 'मेमोरेंडम ऑफ़ फॅमिली सेटलमेंट-पारिवारिक निपटान के ज्ञापन का महत्व ''  को लेकर पाठकों की उत्साहवर्धक टिप्पणी प्राप्त हुई लेकिन इसके साथ ही एक पाठक ''श्री मानस जायसवाल'' जी के तो कई प्रश्न थे जिनके निवारण हेतु मैं एक नयी  पोस्ट आप सभी से साझा कर रही हूँ .पहले श्री मानस जायसवाल जी की टिप्पणी- बहुत ही उपयोगी लेख| लेकिन क्या ऐसे "जुबानी खानदानी बंटवारे का यादाश्तनामा" लिखित में बनने के बाद इसको लागू कराने की कोई समयसीमा होती है ?? क्या इसे रजिस्टर्ड कराना ज़रूरी है? क्या इसमें सभी सम्पतियों का हवाला होना ज़रूरी है? इस नाम के अग्रीमेंट को हम "Family Settlement" कहेंगे या "Family Partition Deed" तो आप सभी की जानकारी के लिए बता दूँ कि बहुत सी बार घर में अपनेआप हिस्से बांटकर रहना आरम्भ कर देते हैं तब बाद में ये याद रहे कि हमने क्या बाँटा है इसे एक कागज पर लिख लेते हैं ये कागज सादा  भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता पर इस पर घर से बाहर के कम से कम दो लोगों के हस्ताक्षर होने चाहियें और इस पर सभी हिस्सेदारों के हस्ताक्...

मेमोरेंडम ऑफ़ फैमिली सेटलमेंट ''पारिवारिक निपटान के ज्ञापन '' का महत्व

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संपत्ति का विभाजन हमेशा से ही लोगों के लिए सरदर्द रहा है और कलह,खून-खराबे का भी इसीलिए घर के बड़े-बुजुर्ग हमेशा से इसी कोशिश में रहे हैं कि यह दुखदायी कार्य हमारे सामने ही हो जाये .इस सबमेँ करार का बहुत महत्व रहा है .करार पहले लोग मौखिक भी कर लेते थे और कुछ समझदार लोग वकीलों से सलाह लेकर लिखित भी करते थे लेकिन धीरे धीरे जैसे धोखाधड़ी बढ़ती चली गयी वैसे ही करार का लिखित होना और निश्चित कीमत के स्टाम्प पर होना ज़रूरी सा हो गया .अब लगभग सभी करार सौ रूपये के स्टाम्प पर होते हैं क्योंकि सौ रूपये के स्टाम्प पर होने से करार का रजिस्टर्ड होना आसान हो जाता है .लेकिन इस सबके साथ एक बात यह भी है कि अब भी बहुत से करार ऐसे किये जा सकते हैं जो लिख भी लिए जाएँ और उनका रजिस्टर्ड होना ज़रूरी भी न हो .वैसे भी रजिस्ट्रेशन एक्ट ,१९०८ की धारा १७[२] कहती है कि ''१७[२][i ] किसी भी समझौता अभिलेख का रजिस्ट्रेशन ज़रूरी नहीं है '' किन्तु ऐसा नहीं है कि इस धारा को मानकर आप सभी जगह समझौते को रजिस्टर्ड कराने से बचें .वास्तव में मैं यहाँ पारिवारिक समझौते से विभाजन की बात कर रही हूँ जिसके लिए कहा गया ...

उत्तर प्रदेश तहसील दिवस :एक धोखा

       हर महीने के पहले और तीसरे मंगलवार को उत्तर प्रदेश के हर जिले में हर तहसील पर तहसील दिवस आयोजित किया जाता है .जिसमे कभी जिला मजिस्ट्रेट तो कभी उप-जिला मजिस्ट्रेट उपस्थित हो लोगों की समस्याओं को सुनते हैं और उनकी समस्याओं को देखते हुए तहसील स्तर के विभागों से जिन कर्मचारियों की वहां उपस्थित  होती है उन्हें लोगों की समस्याओं के समाधन हेतु निर्देश भी देते हैं .ये सब इतनी अधिकारिता से होते देख एक बार तो पीड़ित को लगता है कि अब उसकी समस्या सक्षम अधिकारी के सामने पहुँच गयी है और अब इस समस्या का समाधान निश्चित रूप से हो जायेगा और वह ये सोचकर घर आकर चैन की बंसी बजाता है .                  लेकिन सच्चाई कुछ और है और जो केवल वही बता सकता है जो कम से कम एक बार तो तहसील दिवस में अपनी समस्या लेकर गया हो और मैं उन्हीं लोगों में से एक हूँ जो तीन  बार तहसील दिवस में अपनी समस्या लेकर गई हूँ  और निराशा ही हाथ लेकर आयी हूँ मेरी समस्या क्या है कोई बहुत व्यक्तिगत नहीं है बल्कि सार्वजानिक है और जिसके लिए मैं अकेले नगरपालिका...

दुष्कर्म व् प्रकृति विरुद्ध अपराध-भारत रूस से आगे

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11  महीने पहले रूस ने महिलाओं को दुष्कर्म करने वाले को निजी प्रतिरक्षा में मारने की अनुमति दी और जिससे वहां यह आशा की गयी कि यह कानून वहां पुरुषों और लड़कों को भी निजी प्रतिरक्षा में उनके साथ ऐसा करने वालों को मृत्यु दंड देने की अनुमति देगा .- ''New Law in Russia Allows Women to Kill Rapist in Self-Defense: Hopefully the law will also recognize the rights of men and boys who are being raped or sexually assaulted to self defense too  ( naturalhealingmagazine.net ) submitted  11 months ago  by DougDante''   जबकि भारत में पहले से ही इन अपराधों के लिए निजी प्रतिरक्षा में मृत्यु कारित करने का अधिकार दिया गया है .     भारतीय दंड संहिता की धारा 100 कहती है - ''शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार ,पूर्ववर्ती अंतिम धारा में वर्णित निबंधनों के अधीन रहते हुए ,हमलावर की स्वेच्छया मृत्यु कारित करने या कोई अन्य अपहानि कारित  करने तक है ,यदि वह अपराध ,जिसके कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है ,एतस्मिनपश्चात प्रगणित भाँतियो...

ये भी क्रूरता है संभलकर ....

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           आपका लिखा एक खत आपको क्रुर बताने और तलाक दिलाने के लिए काफी है। कोर्ट ने अपने पत्नी से अलग रह रहे एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही।   द टाइम्स ऑफ इं‌‌डिया में छपी एक खबर के मुताबिक पीड़ित व्यक्ति 28 साल से अपनी पत्नी से अलग रह रहा था। 1990 में उसकी पत्नी ने गुस्से में आकर अपने पति को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में पत्नी ने कहा कि वह तलाक चाहती है। उसे अपना एक पूर्व प्रेमी वापस मिल गया है, और वह उससे शादी करना चाहता है।   पत्नी ने पत्र में यह भी बताया कि वह उनकी बेटी को भी अपनाने को तैयार है। उस वक्त महिला का पति विदेश में नौकरी करता था जबकि उसकी पत्नी भारत में ही थी।   यह मामला ट्रायल कोर्ट में चल रहा था। अब इस मामले में दिल्‍ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पति को तलाक की अनुमति दे दी। कोर्ट ने व्यक्ति को तलाक की अनुमति के साथ कहा कि एक पत्र भी जिसमें मानसिक कष्ट हो उसे भी क्रुरता का व्यवहार का आधार माना जा सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश नाजमी वजीरी ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार र...