डी एन ए टेस्ट -कोर्ट पिता के चरित्र और सम्मान को भी महत्व दें.

 


   डी एन ए टेस्ट आज की फैमिली कोर्ट प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, एक तरफ जहाँ पितृत्व की अभिस्वीकृति के लिए डीएनए टेस्ट जरुरी हो जाता है वहीं कोर्ट द्वारा बच्चे का हित देखते हुए डीएनए टेस्ट का आदेश बहुत ही सीमित मामलों में दिया जाता है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व एन डी तिवारी के अवैध संबंधो से पैदा पुत्र रोहित शेखर ने जब कोर्ट में डीएनए टेस्ट के लिए याचिका लगाई तो कोर्ट ने बेटे की ही मांग को देखते हुए डीएनए टेस्ट का आदेश दिया और डीएनए टेस्ट के माध्यम से रोहित शेखर ने अपना अधिकार प्राप्त किया, किन्तु अधिकांश मामलों में जहाँ पिता डीएनए टेस्ट की मांग करते हैं वहां कोर्ट इस मांग को बच्चे का हित देखते हुए लगभग ठुकरा देती है.

इसी मुद्दे पर अभी हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने SKP बनाम KSP (रिट याचिका 3499/2020) में कहा-

" कि यदि किसी बच्चे की मां उसके पितृत्व की जांच के लिए डीएनए टेस्ट कराने के लिए सहमत भी हो तब भी कोर्ट को बच्चे के अधिकारों का संरक्षक (Custodian) बनकर उसके हितों पर विचार करना आवश्यक है। कोर्ट को टेस्ट के पक्ष और विपक्ष दोनों पहलुओं का मूल्यांकन करना चाहिए, न कि केवल माता-पिता के विवाद को हल करने के उद्देश्य से डीएनए टेस्ट का आदेश दे देना चाहिए."

➡️ डीएनए टेस्ट क्या है-

डीएनए टेस्ट, जिसे आनुवंशिक परीक्षण भी कहा जाता है, एक प्रयोगशाला प्रक्रिया है जो किसी व्यक्ति के डीएनए (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) की जांच करती है। डीएनए में हमारे शरीर की कोशिकाओं में पाए जाने वाले निर्देश होते हैं, जो हमारे विकास, कामकाज और प्रजनन के लिए आवश्यक हैं। डीएनए टेस्ट का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है, जैसे कि पितृत्व की पुष्टि करना, आनुवंशिक रोगों की पहचान करना, वंशावली की जानकारी प्राप्त करना, और अपराध विज्ञान में अपराधियों की पहचान करना। 

🌑 डीएनए टेस्ट के प्रकार:

✒️ पितृत्व परीक्षण:

यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि क्या कोई व्यक्ति किसी बच्चे का जैविक पिता है या नहीं। 

✒️ आनुवंशिक परीक्षण:

यह किसी व्यक्ति में आनुवंशिक बीमारियों के जोखिम का पता लगाने के लिए भी किया जाता है। 

✒️ वंशावली परीक्षण:

यह किसी व्यक्ति के पूर्वजों और जातीयता के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए भी किया जाता है। 

✒️ फोरेंसिक डीएनए परीक्षण:

यह अपराध स्थलों से डीएनए नमूनों का विश्लेषण करके अपराधियों की पहचान करने के लिए भी किया जाता है। 

🌑 डीएनए टेस्ट कैसे किया जाता है:

1️⃣. नमूना संग्रह:

डीएनए टेस्ट के लिए, एक नमूना लिया जाता है, जैसे कि रक्त, लार, या बालों के नमूने।

2️⃣. डीएनए निष्कर्षण:

नमूने से डीएनए निकाला जाता है।

3️⃣. डीएनए विश्लेषण:

डीएनए के विशिष्ट क्षेत्रों का विश्लेषण किया जाता है।

4️⃣. परिणामों की व्याख्या:

डीएनए टेस्ट के परिणामों को व्याख्यायित किया जाता है। 

🌑 डीएनए टेस्ट के लाभ:

✒️ डीएनए टेस्ट किसी व्यक्ति के आनुवंशिक स्वास्थ्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर सकता है। 

✒️ यह आनुवंशिक बीमारियों के जोखिम का पता लगाने में मदद कर सकता है, जिससे प्रारंभिक रोकथाम या उपचार संभव हो सकता है। 

✒️ डीएनए टेस्ट पितृत्व और वंशावली के बारे में जानकारी प्रदान कर सकता है। 

✒️ यह आपराधिक मामलों में अपराधियों की पहचान करने में भी मदद कर सकता है। 

🌑 डीएनए टेस्ट के नुकसान:

✒️ डीएनए टेस्ट महंगा हो सकता है। 

✒️ परिणामों की व्याख्या जटिल हो सकती है और इसमें कुछ समय लग सकता है। 

✒️ डीएनए टेस्ट के कुछ नैतिक और सामाजिक निहितार्थ भी हो सकते हैं। 

कुल मिलाकर, डीएनए टेस्ट एक शक्तिशाली उपकरण है जिसका उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। हालांकि, डीएनए टेस्ट कराने से पहले इसके लाभों और संभावित नुकसानों पर सावधानीपूर्वक विचार करना महत्वपूर्ण है। 

 और यही ध्यान में रखते हुए जस्टिस आर.एम. जोशी की एकलपीठ ने यह टिप्पणी की कि यदि किसी बच्चे की मां उसके पितृत्व की जांच के लिए डीएनए टेस्ट कराने के लिए सहमत भी हो तब भी कोर्ट को बच्चे के अधिकारों का संरक्षक (Custodian) बनकर उसके हितों पर विचार करना आवश्यक है। कोर्ट को टेस्ट के पक्ष और विपक्ष दोनों पहलुओं का मूल्यांकन करना चाहिए, न कि केवल माता-पिता के विवाद को हल करने के उद्देश्य से डीएनए टेस्ट का आदेश दे देना चाहिए.", 

     इस केस में महिला ने फैमिली कोर्ट द्वारा उसके बच्चे का DNA टेस्ट कराने के आदेश (दिनांक 7 फरवरी 2020) को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने यह आदेश महिला के पति की अर्जी पर दिया था, जिसने बच्चे की वैधता पर सवाल उठाया था और आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी व्यभिचारी जीवन जी रही थी तथा वैवाहिक घर छोड़ने के बाद ही उसने बच्चे को जन्म दिया। जिस पर महिला ने तर्क दिया कि जब वह पति का घर छोड़कर गई तब वह पहले ही तीन महीने की गर्भवती थी। कोर्ट ने कहा, 

" कि मान लिया जाए कि पत्नी डीएनए टेस्ट के लिए सहमत थी, तब भी यह कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह बच्चे के सर्वोत्तम हितों पर विचार करे। कोर्ट ने कहा कि किसी को भी जबरन ब्लड टेस्ट (डीएनए टेस्ट) के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। एक नाबालिग बच्चा यह निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता कि वह टेस्ट कराए या नहीं।" 

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि पति अगर केवल व्यभिचार के आरोप लगाता है और यह साबित नहीं कर पाता कि बच्चे के जन्म के समय उसका पत्नी से कोई संपर्क नहीं था , तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत बच्चे की वैधता की कानूनी मान्यता को चुनौती नहीं दी जा सकती। 

   जस्टिस जोशी ने कहा, "अगर पति का आरोप यह है कि पत्नी व्यभिचारी जीवन जीती है तो इस तथ्य को अन्य सबूतों से साबित किया जा सकता है। इसके लिए बच्चे को डीएनए टेस्ट के लिए बुलाना आवश्यक नहीं है।" इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी। 

    कोर्ट का बच्चे का हित देखते हुए डीएनए टेस्ट से इंकार किये जाने का यह निर्णय एकतरफा निर्णय ही कहा जायेगा क्योंकि इस तरह कोर्ट एक उस जिंदगी की परवाह तो कर रही है जिसकी जिंदगी अभी सही तरह से शुरू भी नहीं हुई है और उस जिंदगी का क्या, जिसके लिए जिंदगी का नाम ही सच्चरित्र होना है. भारतीय धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि 

" धन गया तो कुछ नहीं गया

स्वास्थ्य गया तो थोड़ा सा गया

अगर चरित्र गया तो

सब कुछ चला गया. "


    ऐसे में कोर्ट एक पति का नाम एक ऐसी संतान को दे रही है जिसे उसकी पत्नी ने व्यभिचार में पैदा किया है और जिसके लिए क़ानून ने भरण पोषण तक के रास्ते दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में बंद किये हुए हैँ. आदमी दत्तक प्रक्रिया द्वारा दूसरे के बच्चे को ख़ुशी से पाल सकता है किन्तु उस बच्चे को पालने के लिए उसका ह्रदय कभी स्वीकार नहीं करेगा जिसे उसकी पत्नी ने उसकी जगह किसी अन्य पुरुष के संसर्ग से पैदा किया हो और यह भी एक अटल सत्य है कि कोई भी पुरुष अपनी संतान को नाजायज की श्रेणी मे रखवाकर अपमानित नहीं करेगा. कोर्ट को भारतीय संस्कृति की इस आत्मसम्मान और सच्चरित्र की महानता के महान आदर्शो को भी ऐसे निर्णय लेते समय ध्यान में रखना होगा.

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

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