मौ अहसान के अनिल पंडित बनने पर रोक लगाने वाले ADM को नया आदेश पारित करने का निर्देश - इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गैरकानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध कानून के तहत एक मुस्लिम व्यक्ति के हिंदू धर्म अपनाने के मामले में ADM की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराज़गी जताई है। कोर्ट ने कहा कि ADM ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बार-बार पुलिस जांच करवाई और आपराधिक मामले को आधार बनाकर धर्मांतरण प्रमाणन आवेदन खारिज कर दिया।
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने फिलहाल प्रयागराज के ADM (प्रशासन) द्वारा पारित उस आदेश को स्थगित कर दिया है, जिसमें याचिकाकर्ता के 'सनातन धर्म' अपनाने की घोषणा को स्वीकार करने से इनकार किया गया था। कोर्ट ने ADM को तीन सप्ताह के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
मामला इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर अनिल पंडित (पूर्व नाम मोहम्मद अहसान) से जुड़ा है। उन्होंने 12 जनवरी 2022 को यूपी धर्मांतरण कानून की धारा 8 के तहत धर्म परिवर्तन की घोषणा दी थी। बाद में आर्य समाज मंदिर में 14 मार्च 2022 को विधिवत धर्मांतरण की प्रक्रिया पूरी हुई। 2022 और 2023 में पुलिस की दो जांच रिपोर्टों में स्पष्ट कहा गया कि धर्मांतरण स्वेच्छा से हुआ और इसमें किसी प्रकार का दबाव या प्रलोभन नहीं था। इसके बावजूद ADM ने एक और जांच रिपोर्ट मंगवाई, क्योंकि याचिकाकर्ता के ससुर ने उसके खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। ससुर अपनी बेटी की शादी का विरोध कर रहे थे।
अंततः 9 अगस्त 2024 को ADM ने धर्मांतरण प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया। आदेश में FIR, चार्जशीट और दंपति के बीच हुए 1 लाख रुपये के लेनदेन को आधार बनाया गया। ADM ने माना कि धर्मांतरण विवाह के उद्देश्य से और कथित प्रभाव में किया गया। हाईकोर्ट ने दंपति से व्यक्तिगत बातचीत के बाद पाया कि दोनों ने स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। पत्नी ने कोर्ट को बताया कि 1 लाख रुपये की रकम मेडिकल इमरजेंसी के दौरान एक मित्र के रूप में दी गई आर्थिक सहायता थी।
कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत केवल प्रक्रिया की जांच की जानी थी, न कि विवाह की वैधता या आपराधिक मामले की। पीठ ने टिप्पणी की कि FIR दर्ज होने के बाद बार-बार जांच कराना ADM द्वारा “ऐसी शक्ति का प्रयोग” था, जो कानून ने उसे दी ही नहीं।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि
केवल चार्जशीट दाखिल होने से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता, क्योंकि अपराध सिद्ध होना ट्रायल का विषय है। अदालत ने दंपति को राहत देते हुए कहा कि वे सम्मानपूर्वक वैवाहिक जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं और पुलिस उनके जीवन में हस्तक्षेप नहीं करेगी।
मामले की अगली सुनवाई 27 मई 2026 को होगी
petitioner-Anil Pandit (earlier known as Mohammad Ahashan), Assistant Professor at an institute of the Allahabad University.
स्रोत - LIVELAW. IN
प्रस्तुति
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)

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