विवाहित पुत्री को अनुकम्पा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता -सुप्रीम कोर्ट
इस ऐतिहासिक मामले (मामले का शीर्षक: कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) में मुख्य याचिकाकर्ता कुलसुम निशा थीं और प्रतिवादी उत्तर प्रदेश सरकार (एवं संबंधित प्राधिकरण) थे। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था।
➡️ मामले के मुख्य पक्षकार (Parties):
⚫ याचिकाकर्ता (Petitioner):
कुलसुम निशा ( Kulsum Nisha )
⚫ प्रतिवादी (Respondents):
उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य ( State of Uttar Pradesh & Ors. )
⚫ विवाद का मुख्य कारण:
उत्तर प्रदेश सरकार के वर्ष 2019 के शासनादेश में अनुकंपा नियुक्ति के लिए "परिवार" की परिभाषा में अविवाहित, तलाकशुदा और विधवा बेटियों को तो शामिल किया गया था, लेकिन विवाहित बेटियों को बाहर रखा गया था। याचिकाकर्ता कुलसुम निशा (जिनकी माता की मृत्यु के बाद उन्हें उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस नहीं दिया गया था) ने इसी नियम को चुनौती दी थी।सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय:न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के इस नियम को रद्द कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि मात्र विवाह हो जाने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा के लाभ से वंचित करना मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि
विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है। परिवार की परिभाषा से विवाहित बेटियों को बाहर रखना स्पष्ट रूप से मनमाना, अनुचित और संवैधानिक रूप से गलत है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। उच्च न्यायालय ने कहा था कि अनुकंपा नियुक्ति के उद्देश्य से परिवार की परिभाषा में विवाहित बेटी को शामिल नहीं किया जाता है।
एक अनुकंपा नियुक्ति में, यदि कोई कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है या चिकित्सा कारणों से समय से पहले सेवानिवृत्त हो जाता है, तो सरकार परिवार के किसी सदस्य को नौकरी देती है।
सर्वोच्च न्यायालय एक महिला द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था, जो एक मृतक व्यापारी की विवाहित बेटी है। महिला ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें अनुकंपा के आधार पर उचित मूल्य की दुकान के डीलर के रूप में उसकी नियुक्ति के दावे को खारिज कर दिया गया था। महिला ने 2019 के उस सरकारी आदेश को चुनौती दी थी जिसमें विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर रखा गया था।
द्वारा
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)
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