हत्यारोपी परिवार का सदस्य अनुकम्पा नियुक्ति से वंचित नहीं - सुप्रीम कोर्ट



 सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि

 यदि किसी मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार के किसी सदस्य पर हत्या का आरोप है, तो उसे मिलने वाली 'अनुकंपा नियुक्ति' (Compassionate Appointment) को सिर्फ इस आधार पर नहीं रोका जा सकता, क्योंकि नियमों में नौकरी पर रोक का कोई प्रावधान नहीं है।

मामले से जुड़े दोनों पक्षों (दोनों Parties) की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है:

1. याचिकाकर्ता (Appellant):

 अतुल चौहान

परिचय

अतुल चौहान मृतक सरकारी कर्मचारी (गजेंद्र सिंह चौहान) के बेटे हैं।

मुद्दा

उनके पिता की मृत्यु के बाद, अतुल ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी (Compassionate Job) के लिए आवेदन किया था।

विवाद की वजह:

 हरियाणा सरकार के अधिकारियों ने उनकी नियुक्ति को इसलिए लंबित रखा क्योंकि अतुल की मां पर उनके पिता की हत्या की साजिश रचने का आरोप था और उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। मां और भाई द्वारा अपने अधिकार अतुल के पक्ष में छोड़ने के बावजूद अधिकारियों ने उसे नौकरी देने से मना कर दिया था।

2. प्रतिवादी (Respondent): 

राज्य सरकार (हरियाणा) और अधिकारी

नियमों का हवाला: प्रतिवादी राज्य सरकार की तरफ से 'हरियाणा सिविल सेवा (दया के आधार पर आर्थिक सहायता या नियुक्ति) नियम, 2019' का हवाला दिया गया था।

नियम 23(1) का आधार: सरकार के अनुसार, नियम 23(1) यह कहता है कि यदि परिवार का कोई सदस्य कर्मचारी की हत्या या हत्या के लिए उकसाने का आरोपी है, तो उसे मिलने वाली 'अनुकंपा वित्तीय सहायता' (Compassionate Financial Assistance) रोक दी जाएगी। इसी नियम के आधार पर अधिकारियों ने अतुल की अनुकंपा नियुक्ति को भी रोक दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और व्यवस्था:

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया:

नियमों में अंतर: अदालत ने कहा कि नियम 23(1) केवल 'वित्तीय सहायता' रोकने के लिए है, 'अनुकंपा नौकरी/नियुक्ति' रोकने का कोई भी प्रावधान इन नियमों में नहीं है।

अदालत की टिप्पणी: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के नियमों की इस खामी (Anomaly) पर हैरानी जताई कि अपेक्षाकृत छोटी राहत यानी 'वित्तीय सहायता' को आपराधिक मामलों में रोकने का नियम है, लेकिन बड़ी राहत यानी स्थायी नौकरी के लिए ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।

अदालत ने कहा कि 

वर्तमान व्यवस्था एक अजीब स्थिति पैदा करती है, जहां किसी व्यक्ति को मृत कर्मचारी की हत्या के मामले में आरोपी होने के कारण वित्तीय सहायता तो नहीं मिलेगी, लेकिन वह उसी दौरान सरकारी नौकरी के लिए पात्र माना जा सकता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि

 यह स्थिति प्रशासनिक कठिनाइयों, भ्रम और अनावश्यक मुकदमेबाजी को जन्म दे सकती है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति निर्माण का विषय है और न्यायालय नियमों की व्याख्या करते हुए उनके दायरे का विस्तार नहीं कर सकता। चूंकि नियम 23(1) में केवल वित्तीय सहायता का उल्लेख है, इसलिए अदालत उसे अनुकंपा नियुक्ति तक नहीं बढ़ा सकती।

पीठ ने कहा,

 “न्यायालय का काम कानून को उसी रूप में लागू करना है जैसा वह है। नियमों में मौजूद कमियों को दूर करना और आवश्यक संशोधन करना राज्य सरकार तथा नियम बनाने वाले प्राधिकरण का कार्य है।” 

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को सुझाव दिया कि 

वह ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट प्रावधान बनाए, जहां सरकारी कर्मचारी की हत्या या हत्या के लिए उकसाने के मामले में परिवार का कोई सदस्य आरोपी हो और वह अनुकंपा नियुक्ति का दावा कर रहा हो।

 अदालत ने यह भी माना कि

 मौजूदा नियमों में यह एक गंभीर विधायी कमी है, जिसे दूर किए जाने की आवश्यकता है, लेकिन इसका समाधान न्यायिक आदेश के बजाय नियमों में संशोधन के माध्यम से ही संभव है।

निर्देश: अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें मां के खिलाफ हत्या के आरोपों के कारण बेटे की नौकरी का दावा ठुकरा दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि अतुल चौहान के अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर 3 महीने के भीतर गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाए।

केस शीर्षक - अतुल चौहान बनाम हरियाणा राज्य

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

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