पति "हाउस हसबैंड" - चैन्नई हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ द्वारा वैवाहिक विवाद का निस्तारण करते हुए पति को "हाउस हसबैंड" कहते हुए एक ऐतिहासिक टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि "अगर समाज में 'हाउसवाइफ'(घर संभालने वाली पत्नी) हो सकती है, तो 'हाउस हसबैंड' (घर संभालने वाला पति) भी हो सकता है और इसे एक 'नया नॉर्मल' (New Normal) बनने देना चाहिए।"

➡️ इस मामले से जुड़ी पक्षकार और कोर्ट के निर्णय का पूर्ण विवरण नीचे दिया गया है:

⚖️ मामले और पक्षकार का विवरण (Case & Parties Details)केस का नाम:

 वी बनाम ए (V vs A)केस नंबर: CMA(MD) No. 1257 of 2024 

और 

CMA(MD) No. 1446 of 2024

⚖️ सुनवाई करने वाली पीठ: जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम.डी. सुमति की खंडपीठ (Division Bench)

⚖️ फैसले की तारीख: 

23-24 सितंबर 2026

⚖️ पक्षकार (Parties): 

यह मामला तिरुवन्नामलाई के एक डॉक्टर जोड़े से जुड़ा हुआ था (पति एक सफल कार्डियोलॉजिस्ट हैं और पत्नी डेंटिस्ट हैं)। इनका विवाह वर्ष 2011 में हुआ था और इनके दो बेटे हैं।

🔍 मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)

शादी के बाद जब पति अपनी उच्च चिकित्सा शिक्षा (DM कार्डियोलॉजी) की पढ़ाई कर रहा था, तब पत्नी ने अपने करियर को पीछे छोड़ते हुए अपने माता-पिता के घर रहकर बच्चों की परवरिश की और पूरे परिवार को संभाला। पति जब एक सफल डॉक्टर बन गया, तो दोनों के बीच मतभेद शुरू हो गए क्योंकि वह अपनी पत्नी के परिवार से अलग रहना चाहता था, जिससे विवाद बढ़ गया। दोनों पक्ष 5 साल से अधिक समय से अलग रह रहे थे।पत्नी ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) के लिए याचिका दायर की थी, जबकि पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा था। थेनी की फैमिली कोर्ट द्वारा दोनों याचिकाएं खारिज होने के बाद वे हाईकोर्ट पहुंचे थे।

📌 मद्रास हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां (Key Observations)

'होममेकर' एक जेंडर-न्यूट्रल शब्द है: 

कोर्ट ने साफ किया कि घर संभालने की जिम्मेदारी किसी एक जेंडर (महिला) की नहीं है। पुरुषों को भी आगे आकर 'हाउस हसबैंड' की भूमिका निभानी चाहिए ताकि करियर बनाने वाली महिलाओं को मदद मिल सके।

⚖️ घरेलू काम का आर्थिक मूल्य: 

कोर्ट ने माना कि घर संभालने वाले पार्टनर का योगदान अमूल्य होता है। पति की व्यावसायिक सफलता में पत्नी के उस बलिदान का बड़ा हाथ था, जिसके तहत उसने बच्चों और घर की देखभाल की।

✒️ पुरुष अहंकार (Male Ego) पर चोट: कोर्ट ने कहा कि जब पति संघर्ष कर रहा था तब वह इस पारिवारिक व्यवस्था से सहज था, लेकिन सफल होने के बाद पुरुष अहंकार के कारण उसने पत्नी के योगदान को नजरअंदाज कर दिया।

💰 अंतिम फैसला और सेटलमेंट (Final Judgment & Settlement)

अदालत ने पाया कि यह विवाह पूरी तरह से टूट चुका है और इसे वापस नहीं जोड़ा जा सकता। इसके बाद, दोनों पक्षों की आपसी सहमति (Mutual Consent) के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत तलाक की मंजूरी दे दी गई।कोर्ट ने पति द्वारा दिए गए ₹2.5 करोड़ के वित्तीय सेटलमेंट को मंजूर करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

⚖️ पत्नी के लिए: ₹1.5 करोड़ रुपये 3 महीने के भीतर पत्नी के बैंक खाते में जमा करने होंगे।

⚖️ बच्चों के लिए: दोनों नाबालिग बच्चों के नाम पर ₹50-50 लाख (कुल 1 करोड़ रुपये) 1 वर्ष के भीतर फिक्स डिपॉजिट (FD) कराने होंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक की डिक्री तभी पूरी तरह प्रभावी होगी जब पति इन सभी वित्तीय दायित्वों को पूरा कर देगा।

द्वारा

शालिनी कौशिक

एडवोकेट

कैराना (शामली) 

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